Friday, 13 April 2018

हम से ही नज़रें चुराने लगे....

मौसम ज़रा ज़र्द हो क्या गया,
वो हम से ही नज़रें चुराने लगे।

कल तक रहे धड़कनों की तरह,
साये से भी पीछा छुड़ाने लगे।

काँच से भी नाज़ुक अरमां मेरे,
छुआ तो लहू ये बहाने लगे।

शुक्र है तुम्हें सम्भलना आ गया,
हम आँखों से मोती गिराने लगे।

तनहा कटे क्यों उमर का सफ़र,
यादों की महफ़िल सजाने लगे।

हो सके रौशनी राहों में तेरी,
यही सोच खुद को जलाने लगे।

मिलेंगे कई मोड़ रुसवाईयों के,
डगर प्रेम कोई जो जाने लगे।

जो चाहो तो महसूस करना हमें,
हम भी घटा बन के छाने लगे।

दिल ये मेरा गोया दिल ही तो है,
भला हम इसे क्यों समझाने लगे।

आहट जरा-सी हुई क्या 'रवीन्द्र' ,
सौ अरमान दिल में सजाने लगे।

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐
*9424142450#

Thursday, 8 March 2018

जीवंत हैं ये नारियाँ...

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी शक्ति को प्रणम्य निवेदित पंक्तियाँ...
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सृजन को करती सदा जीवंत हैं ये नारियाँ,
हर विधा हर काल में ये शक्ति का पर्याय हैं...

गोद में खेले ये जब, भर दे हमें वात्सल्य से,
रूप लें सीता का तो ये त्याग का अभिप्राय हैं...

कर समर्पण मन वचन मीरा बनी है रानियाँ,
रक्त पूरित त्याग कर बनती ये पन्ना धाय है...

गगन के जो पार जाकर, प्रेम का संदेश दें,
कल्पना साकार कर, तारों-सा जगमगाए हैं...

ठान ले मन में यदि, अवनी झुका दें आसमां,
नाम जो इंदिरा का लें दुश्मन भी थरथराए हैं...

विधाता हमें ज्ञान दो, सम्मान उनका कर सकें,
प्रेम सिंचित धरा को, गुलशन-सा जो महकाए हैं...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐
*9424142450# www.kaviravindra.com

Thursday, 22 February 2018

हौसलों को उड़ान दे...

ना मंजिलें न मुकाम दे,
ना मख़मली सी शाम दे...
नहीं भूलना मुझे वक़्त तू,
मेरे हौसलों को उड़ान दे...

जिस गली से गुज़र गया,
उस राह को आबाद रख...
जिस शहर में हूँ जी रहा,
उसे कोई तो पहचान दे...

आयेंगे खैरियत पूछने,
जिन्होंने कब का भुला दिया...
उन मेरे रहमो अजीज़ को,
मेरा प्यार भरा ये पयाम दे...

नहीं मेरी कोई ख़ता रही,
ना जुल्म लोगों ने किया...
ग़ुरबत में मैं जीता रहा,
मेरे हक में कोई ये बयान दे...

वो सुबह नई तो आयेगी,
मुझे प्यार से जो बुलाएगी...
यही जुस्तजू है मेरी,
उस रब को मेरा सलाम दे...

दिल की कही सुनता रहा,
यही ख़्वाब मैं बुनता रहा...
मेरी ज़िन्दगी के हो मायने,
मेरे नज़्म को तू कलाम दे...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Thursday, 14 December 2017

दुनियां तू सजाने को चली आ...

सब तोड़ के तिलिस्म ज़माने के चली आ,
वादे किए जो हमने  निभाने को चली आ...

अब आ भी जा सूनी है ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,
बेशक मुझे तू  छोड़ के जाने को चली आ...

सांसें  हुई  बोझिल  ये  धड़कने  गवाह हैं,
रूठे हुए से दिल को  मनाने  को चली आ...

खोई हुई मंज़िल  सभी  राहें धुआँ - धुआँ,
शम्मा मेरी महफ़िल में जलाने को चली आ...

ये काली घटाएं हैं  या  बिखरी तेरी जुल्फ़ें,
बरखा तू मेरी प्यास बुझाने को चली आ...

उलझे हुए अरमान सभी ख्वाहिशें 'रवीन्द्र',
उजड़ी मेरी दुनियां तू सजाने  को चली आ...

...© रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Friday, 8 December 2017

कुछ पल जो अकेला होता हूँ...

कुछ पल जो अकेला होता हूँ,
शब्दों की माला पिरोता हूँ,
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हँस कर आँखों को भिगोता हूँ..
कुछ पल जो....

दिल के जख्म दिखाएं किसे,
ये दर्द करें किसको बयां,
पथरीली ये जमीन हुई,
चुभता है अब आसमां,
इस लब पे बिखेरे हुए हँसी,
मैं दिल ही दिल में रोता हूँ...
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हंस कर आँखों को भिगोता हूँ...
कुछ पल जो....

भूला मुझे जहान तो क्या, 
जीवन है बियाबान तो क्या,
राह अंधेरे हैं मुमकिन,
कटते नहीं हैं ये पल छिन,
बिखरे हुए जो लमहें हैं,
यादों के हार पिरोता हूँ...
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हंस कर आंखों को भिगोता हूँ...
कुछ पल जो....

आएगा कोई राहों में,
भर लेगा मुझे बाहों में,
करवट बदल के रात कटे,
दिन सिसकी और आहों में,
ये धुँआ-धुँआ तनहा आलम,
ना जागता हूँ ना सोता हूँ,
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हँस कर आँखों को भिगोता हूँ...
कुछ पल जो....

कुछ पल जो अकेला होता हूँ...
शब्दों की माला पिरोता हूँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Tuesday, 5 December 2017

खुशनुमा सुबह के ओ सौदागर...


खुशनुमा सुबह के ओ सौदागर, 

बड़ा खूब ढाया है तूने कहर,
लेकर उनींदे हमारी सभी,
देते हो क्यों अलसाया सहर...

कैसी है ख्वाबों की ये अनकही,
बातें दिलों की दिल मे रही,
सुहाना लगे है ख्वाबों का सफर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...

धड़कन क्यों बेताब हैं आजकल,
सदियों सा लागे हमें एक पल,
मंज़िल से है खूबसूरत डगर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...

ख्वाहिश जवां कैसे होने लगी,
तनहाई सिसक के है रोने लगी,
आंसू हैं या कोई मीठा जहर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...

खुशनुमा सुबह के ओ सौदागर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...


...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Friday, 24 November 2017

सँवारो इन्हें.... मेरी माँ...


बेचैन मन फिर ढूंढे वो आँचल,
बन कर हवा उड़ चली हो कहाँ...

यूँ तो खिले चाँद तारे हैं बेशक,
लगे स्याह फिर क्यों हमें आसमां...

ये धरती, अम्बर, नज़ारे वही हैं,
लगे फिर क्यों सूना ये सारा जहां...

चलना सिखाया हमें थाम उँगली,
कोई देख ले बन गया कारवां...

हासिल है दुनिया सबकी नज़र में,
वक़्त भी जालिम हुआ मेहरबां...

कहने को बहुत कुछ है दिल में,
बातें किसे सब करें हम बयां...

रिश्ते हुए कई बेज़ार तुम बिन,
आ कर सँवारो इन्हें मेरी माँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

24 नवम्बर... नवम पुण्यतिथि पर ममतामयी माँ को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि...

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...