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Saturday, 2 September 2017

महबूब सा मरहम नहीं...



रूठ जाये ये जहां, मुझको कोई गम नहीं...
एक तेरा साथ यारा, महफ़िलों से कम नहीं...

क़ातिलाना हर अदा, गुस्ताख़ हैं तेरी नज़र,
सब उलझने बेमायने, जो तेरे पेंचोखम नहीं...

आशिक़ी या दिल्लगी, सोचेंगे हमने क्या किया,
है मगर मालूम, कोई महबूब सा मरहम नहीं...

कीजिएगा इक इशारा, मिलने आएँगे वहाँ,
जिस जगह सैलाब ही सैलाब हो शबनम नहीं...

कोई कहता है दीवाना, कोई आवारा मुझे,
एक तेरा साथ, और चाहत कोई हमदम नहीं...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Wednesday, 5 April 2017

कभी ऐसा भी हो मंज़र...



कभी ऐसा भी हो मंज़र,
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कभी ऐसा भी हो मंज़र,

हँसी चेहरा तेरा देखूँ...
बड़े तनहा से लगते है,
नज़ारे बिन तेरे हमदम...

कभी ख़्वाबों में तुम आओ,

ये आँखें हों उनींदी सी...
मेरी हर सांस हो महकी,
तुम्हारे प्यार का मौसम...

गली वो याद करती है,

जहाँ पायल की छनछन थी...
तरसते हैं नज़ारे भी,
हुआ बरसात का मौसम...

हवा ख़ामोश हो जाये,

कोयल गीत क्यूँ गाये?
जब तुम गुनगुनाती हो,
आये प्यार का मौसम...

....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...