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Tuesday, 11 April 2017

दिन ने मुठ्ठी खोल दिये.....


दिन ने मुठ्ठी खोल दिये, धूप मचल कर बिखर गयी...
अँधेरों से परेशां ये जमीं, खुश होकर जैसे निख़र गयी...
आबोहवा अलसाई सी, बादल की शरारत हो जैसे...
दौड़ लगाती समय सुई, पल में कितनी सँवर गयी..

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐

Tuesday, 4 April 2017

कितने कसक हैं दिल में.....




कितने कशक हैं दिल में, यूँ ही पल रहे...
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कितने कशक है दिल में, यूँ ही पल रहे,
कोई छेड़ दे इन्हें फिर, द्वन्द क्यूँ न हो..?

मेरी बंद मुठ्ठियों में हैं, अक्षर भरे हुए,
मुठ्ठी खोल दूँ जो, फिर छंद क्यूँ न हो..?

सूरज की ओज पाकर, ओस गुम हुआ,
भौरों की चाह में फिर, मकरंद क्यूँ न हो..?

प्रियतम की राह देखें, धड़कन को थामकर,
मधुमास में समय गति, फिर मंद क्यूँ न हो..?

.....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...