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Sunday, 2 April 2017

दो घड़ी का साथ माँगा....



दो घड़ी का साथ माँगा, 
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दो घड़ी का साथ माँगा, तो बुरा क्या हो गया..?
हमने उनका हाथ माँगा, तो बुरा क्या हो गया..?

हम न सोचे थे कभी, दिल का लगाना खेल है..?
स्वर्ग से रिश्ते बने है, क्या ग़ज़ब का मेल है..!
महकते जज़्बात माँगा, तो बुरा क्या हो गया..?
दो घड़ी का साथ माँगा....

और क्या कुछ चाहिये, हमसफ़र वो साथ हो...
साँझ-सुबह रात-दिन, हाथों में उनका हाथ हो...
शबनमी बरसात माँगा, तो बुरा क्या हो गया..?
दो घड़ी का साथ माँगा...

रात हो उजली किरण सी, भोर हो सिन्दूर सा...
दूर तक रौशन जहां हो, प्रेम रस में चूर सा...
मरमरी हालात माँगा, तो बुरा क्या हो गया..?
दो घड़ी का साथ माँगा...


...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐

Saturday, 1 April 2017

मरमरी अहसास सा बंधन अनोखा हो गया...




मरमरी अहसास सा, बंधन अनोखा हो गया...
झील सी आँखों में उसके, उम्र भर को खो गया...
सुरमयी संगीत जैसे, घुल रहा हो फिज़ाओ में...
उसकी बातें वो ही जाने, मैं उसी का हो गया...

....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...