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Saturday, 2 September 2017

महबूब सा मरहम नहीं...



रूठ जाये ये जहां, मुझको कोई गम नहीं...
एक तेरा साथ यारा, महफ़िलों से कम नहीं...

क़ातिलाना हर अदा, गुस्ताख़ हैं तेरी नज़र,
सब उलझने बेमायने, जो तेरे पेंचोखम नहीं...

आशिक़ी या दिल्लगी, सोचेंगे हमने क्या किया,
है मगर मालूम, कोई महबूब सा मरहम नहीं...

कीजिएगा इक इशारा, मिलने आएँगे वहाँ,
जिस जगह सैलाब ही सैलाब हो शबनम नहीं...

कोई कहता है दीवाना, कोई आवारा मुझे,
एक तेरा साथ, और चाहत कोई हमदम नहीं...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Friday, 31 March 2017

बिछड़ ना जाऊँ कहीं...

बिछड़ ना जाऊँ कहीं...
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बिछड़ ना जाऊँ कहीं, सोच कर घबरा गया...
साथ तेरा क्या मिला, बेरंग जमाना भा गया...

सर्द आहें, सुर्ख़ लब, जाने है क्या जादूगरी..?
इश्क़ हैं धीमा ज़हर, हँस के पीना आ गया...

क्या किसी अंजान पे, इस क़दर भी यकीन हो..?
नज़रें उनसे क्या मिली, इक नशा सा छा गया...

है फ़िकर उनकी मग़र, होश अपना खो दिये...
दिल्लगी के खेल में, दिल ये बेचारा गया...

लोग कहते हैं 'रवीन्द्र', आग का दरिया इसे...
जो उतर आया यहाँ, वापस न दोबारा गया...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...