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Friday, 19 April 2019

मुख़्तसर सा आदमी....

बेवजह से हो गए हैं ताल्लुक़ात, कुछ इन दिनों।
आ तलाशें ख़ुद के भीतर, मुख़्तसर सा आदमी।।

बंद कर  आँखें चला  सरपट, समय के चाल सा।
अपने ही उलझन में गिरता, उठ रहा है आदमी।।

खोल कर  गिरहें सभी, चुपचाप है वो आजकल।
ख़ुद से ही अब  ख़ूब  बातें, कर रहा  है आदमी।।

हो सके तो  कैद कर लो,  ख़्वाब सारे  आँखों में।
देख कर औरों की बरकत, जल रहा है आदमी।।

फ़िक्र तेरी, जिक्र तेरा, था कहाँ अब तक रवीन्द्र।
देख ले मौसम की तरह, बदल रहा है आदमी।।

...©रवीन्द्र पाण्डेय

Friday, 14 April 2017

शबनमी सुरमई रात ढलने लगी...




शबनमी सुरमई रात ढलने लगी...
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शबनमी सुरमई रात ढलने लगी,


उम्मीदों का सूरज जवां हो गया...



शिकारा सतह पे मचलने लगा,


छूते ही लहर इक फ़ना हो गया...



ज़ुल्फ़ है या घटाओं की जादूगरी,


बिखरते ही दिलकश समां हो गया...



छुपाओ ना अब चाँद को हाथ में,


रुख़ ए दीदार को शब धुँआ हो गया...



उनकी गली का कोई दे पता,


इश्क़ में 'रवीन्द्र' बदगुमां हो गया...


....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

*9424142450#...

Friday, 31 March 2017

बिछड़ ना जाऊँ कहीं...

बिछड़ ना जाऊँ कहीं...
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बिछड़ ना जाऊँ कहीं, सोच कर घबरा गया...
साथ तेरा क्या मिला, बेरंग जमाना भा गया...

सर्द आहें, सुर्ख़ लब, जाने है क्या जादूगरी..?
इश्क़ हैं धीमा ज़हर, हँस के पीना आ गया...

क्या किसी अंजान पे, इस क़दर भी यकीन हो..?
नज़रें उनसे क्या मिली, इक नशा सा छा गया...

है फ़िकर उनकी मग़र, होश अपना खो दिये...
दिल्लगी के खेल में, दिल ये बेचारा गया...

लोग कहते हैं 'रवीन्द्र', आग का दरिया इसे...
जो उतर आया यहाँ, वापस न दोबारा गया...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...