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Tuesday, 27 April 2021

फिर सहर सुनहरी आएगी...


सुन  स्याह रात  के बाशिंदे,

फिर सहर सुनहरी आएगी।

दे कर नई सांसें जीवन को, 

फिर दुनियां को महकाएगी।।


फिर फूल खिलेंगे गुलशन में,

चिड़िया चहकेंगी  आँगन में।

फिर    बाग   बगीचे   झूमेंगे,

कोयल फिर कूक सुनाएगी।।


आबाद होंगी फिर पगडंडी,

पनघट पर पनिहारिन होंगी।

फिर  ताल  तलैया  मचलेंगे,

जब  बरखा  रानी  आएगी।।


जब साँझ  ढलेगी  दूर कहीं,

दिन खुद को सहज समेटेगा।

घर  लौटने  वाले  लोगों  के,

कदमों  की  आहट आएंगी।।


मिट जाएंगे बैर और गुमान,

आबाद  होंगे  सूने  मकान।

फिर पायल छनकेगी घर में,

दादी फिर  लोरी  सुनाएगी।।


तुलसी का बिरवा महकेगा,

फिर हवनकुंड भी दहकेगा।

गूँजेंगे फिर  से श्लोक, मंत्र,

दुल्हन  आरती  सजाएगी।।


www.kaviravindra.com

9424142450

Friday, 8 June 2018

मैं सोचता हूँ....

मैं सोचता हूँ, एक ख़्वाब बुनूं,
हीरे-मोती, माहताब चुनूं...
दिखला दूं, कौन हूँ! दुनियाँ को,
मन में अक्सर यही बात गुनूं...

क्यों बरखा भाए मधुबन को,
शीतल कर जाए तन-मन को,
भीगेगीं अल्हड़ पंखुड़ियाँ,
उस पल बूंदों का राग सुनूं...
मैं सोचता हूँ...

जब पनिहारिन पनघट जाए,
गागर में सागर भर लाये...
जब बलखाती गुलनार चले,
उस पायल की झनकार सुनूं...
मैं सोचता हूँ...

अंगना बाबुल का बिसराये,
दुल्हन घूंघट में शरमाए...
जब सजे पिया के खातिर वो,
उस पल गजरे का हार चुनूं...
मैं सोचता हूँ...

बचपन जब खेले आंचल में,
जैसे हो चंदा बादल में...
जहाँ बिन बातों के हंसी खिले,
ऐसे ख़्वाबों के तार धुनूं...
मैं सोचता हूँ...

जब बिंदिया गजरा बात करें,
पायल कंगन उत्पात करें...
छुअन से सिमटे तन और मन,
वही प्रेम रचित मनुहार सुनूं...
मैं सोचता हूँ...

हर आंगन में किलकारी हो,
काँधों पर जिम्मेदारी हो...
सिर ढांके बहुएं पैर छुए,
वृन्दावती के वही राग सुनूं...
मैं सोचता हूँ...

मन पुलकित. तन कुसुमित हो,
नहीं प्रेम पिपासा परिमित हो...
उस नटवर नागर मोहन के,
बंशी से धुन मल्हार सुनूं...
मैं सोचता हूँ...

मैं सोचता हूँ, एक ख़्वाब बुनूं
हीरे-मोती, माहताब चुनूं...
दिखला दूं, कौन हूँ! दुनियाँ को.
मन में अक्सर यही बात गुनूं...
मैं सोचता हूँ...
मैं सोचता हूँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 🌹🌹
*9424142450#

Thursday, 14 December 2017

दुनियां तू सजाने को चली आ...

सब तोड़ के तिलिस्म ज़माने के चली आ,
वादे किए जो हमने  निभाने को चली आ...

अब आ भी जा सूनी है ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,
बेशक मुझे तू  छोड़ के जाने को चली आ...

सांसें  हुई  बोझिल  ये  धड़कने  गवाह हैं,
रूठे हुए से दिल को  मनाने  को चली आ...

खोई हुई मंज़िल  सभी  राहें धुआँ - धुआँ,
शम्मा मेरी महफ़िल में जलाने को चली आ...

ये काली घटाएं हैं  या  बिखरी तेरी जुल्फ़ें,
बरखा तू मेरी प्यास बुझाने को चली आ...

उलझे हुए अरमान सभी ख्वाहिशें 'रवीन्द्र',
उजड़ी मेरी दुनियां तू सजाने  को चली आ...

...© रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Friday, 31 March 2017

ढूंढ रहा मन फिर वो आँगन.....



ढूंढ रहा मन फिर वो आँगन,
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ढूंढ रहा मन फिर वो आँगन, कोई तो बतलाये ना..?
फुदक रही गौरेया जिसमें, ऐसा नज़र क्यों आये ना..?

साँझ घनेरी घिर जाये, वो तुलसी का बिरवा महके...
धुआँ उठे फिर छप्पर से, कोई ऐसी दुनिया लाये ना..?

महक उठे सब बाग़ बगीचे, हरियर चुनरी लहराये...
ताल तलैया मचल उठे, क्यूँ ऐसी बरखा आये ना..?

दादा के जूतों में भरकर, दोनों पैर है थिरक रहे...
नींद वही बचपन वाली हो, कोई ऐसी लोरी गाये ना..?

आँगन है पर सूना सूना, चिकनी सारी दीवार हुई...
फुदक फुदक कर दाना चुगने, गौरेया फिर आये ना..?

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐
विश्व गौरेया दिवस पर समर्पित पंक्तियाँ....💐💐🙏🏽

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...