Sunday, 28 May 2017

उम्मीद हैं सांसे, ख़्वाब है ज़िन्दगी....


सुनो, आओ ना, आ भी जाओ,
यूँ दूर रहकर, अब ना तड़पाओ...

एक तुम्हारा ही इंतज़ार,
बस एक तुमसे ही प्यार,
यही मेरी जिन्दगी,
ये सांसो का कारोबार,
दूर-दूर रहकर, अब ना सताओ...
सुनो, आओ ना, आ भी जाओ...

महक है जेहन में,
पहली मुलाकात की,
मौसम तो बदले,
आँखों के बरसात की,
कुछ तो करो ऐसा, बस मेरी हो जाओ...
सुनो, आओ ना, आ भी जाओ...

गलियां सूनी, पनघट प्यासा, रस्ते हैं उदास,
अपने यहाँ होने का, दे दो इन्हें अहसास,
मेरे घर आँगन में, प्रेम दीपक जलाओ...
सुनो, आओ ना, आ भी जाओ...

अधूरे हैं सपने, गुमसुम सब अपने,
किसको सताऊँ? और किसको मनाऊँ?
किस से कहूँ बात, और हल्का हो जाऊँ,
हाँ रूठे हो बेशक़, पर अब मान जाओ...
सुनो, आओ ना, आ भी जाओ...

उम्मीद हैं सांसे, ख़्वाब है ज़िन्दगी,
मुक़म्मल हो मोहब्बत, यही ईबादत और बन्दगी,
ओ मौसम ए ग़ुल, मेरी दुनिया महकाओ...
सुनो, आओ ना, आ भी जाओ...
यूँ दूर रहकर, मुझे ना तड़पाओ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

छाया चलचित्र... गूगल से साभार...

Friday, 19 May 2017

समुंदर खारा हो गया...

समुंदर खारा हो गया...
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बैठ गया कुछ पल के लिए, मैं समुंदर के तीर...
बाँट लूँ ये सोच कर, कुछ  मन के अपने पीर...

आने लगी क्षितिज से, जैसे प्रेम की बयार...
किनारे तक आई  जिसमें, हो कर लहर सवार...

छूने लगी पैरों को, लहर की हर चाल...
जैसे पूछता हो कोई, अपनों से दिल का हाल...

था बोझ मन में खूब, और ज़माने की अनकही...
होठों पे आ सकी ना बात, बन आंसू ही बही...

लगा रेत पर उकेरने, मैं अनमना सा चित्र...
झट से मिटा देती उसे, लहर थी विचित्र...

मैंने सोचा शायद वो, लहर के मन ना भाय...
देती है चित्र हर बार, इसीलिये वो मिटाय...

लहर नें कहा ऐसी कोई बात नहीं है...
ना सोचना समुंदर के जज़्बात नहीं है..?

मैं भी समझ सकती हूँ तेरे मन की पीर...
मत उकेर रेत पर कोई दर्द की तहरीर...

ये रेत कुछ पलों के लिए दर्द क्यों सहे...
ये मीत मेरे मन के हैं, मेरे ही संग रहे...

गर लिखनी है दिल की दास्ताँ, तुझे ऐ मेरे यार...
तो रोक आँसुओ को, बह रहे हैं जार जार...

मत हो अधीर इतना, ये तेरा काम नहीं है...
हर बात से घबराये, वो इंसान नही है...

कहते हो समुंदर ने कुछ सँवारा नही है...
यूँ ही तो समुंदर हुआ खारा नहीं है...

सबके दुखों को सुनती है ना कुछ भी जताती...
दुनियां रहे ना सूखा, सोच मेघ बनाती...

खुद के अगन को मन में समाये हुए है...
कितने ही ज़लज़लों को ये बुझाए हुए है...

पलते हैं कई जीव, पाते हैं निवाले...
लगाये गहरा गोता वो मोती भी निकाले...

कभी सुनी भी होगी समुंदर की वह व्यथा...
अमृत के लिए देवों और असुरों ने जब मथा...

सब ग्रहण किये सुधा, गरल छोड़कर गये...
नाविक भी सतह रहे, पाल मोड़कर गये...

झाँका न किसी ने भी, उसके मन के ही भीतर...
दिखता है जितना गहरा, उससे ज्यादा समुंदर...

दुखियों को काँधा दे के, ये सहारा हो गया...
पी कर जहान के आंसू, समुन्दर खारा हो गया...

...रवीन्द्र पाण्डेय...

Wednesday, 17 May 2017

मेंहदी का रंग गहरा है....

उसके हाथों की मेंहदी का रंग गहरा है,
मिलूँ तो कैसे ज़माने का सख्त पहरा है..

जरा लिहाज़ से रुख़सार दहक जाने दो,
हम भी देखेंगे माहताब जो सुनहरा है..

क्या कहें वस्ल की ये रात कितनी काली है,
मेरी निगाह में तो दूर तक ये सेहरा है..

उसी की चाह में दिल धड़क रहा हर पल,
मिला जो इश्क़ में ये जख़्म बहुत गहरा है..

यही फरियाद मेरी रब से हर घड़ी है 'रवीन्द्र',
सुना है वो भी आशिकों के लिये बहरा है..

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Saturday, 13 May 2017

माँ.... सारा जहां है..


नीचे जमीं है फलक आसमां है,
कितना ही सुंदर ये गुलिस्तां है..

चमके गगन में चाँद और सितारे,
तेरी मोहब्बत के बाकी निशां हैं..

कानों में गूँजे है लोरी हरेक पल,
आँखें जो खोलूँ सब कुछ धुआँ है..

आँचल से तेरे लिपट के मैं रो लूँ,
हर पल तेरी यादों का कारवां है..

तुझसे सजी थी ये जीवन रंगोली,
बेरंग तुम बिन माँ सारा जहां है..

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Friday, 12 May 2017

प्रेम गीत गाए हो तुम...


बरसों से प्यासी धरती पर, मेघा बन कर छाये हो तुम...
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बरसों से प्यासी धरती पर, मेघा बन कर छाए हो तुम...
आसां करने जीवन का सफर, साथी बनकर आए हो तुम...

पहले भी चलती थी पुरवा, खिलती थी कलियाँ बागों में...
दो सुंदर फूल खिला करके, ये आँगन महकाए हो तुम...

ये समय घूमता धुरी पर, दिन और रातें होती थी...
अब दूर गगन भी देखूँ जो, बन कर तारा छाए हो तुम...

ऋतुओं का रेला रहा यही, पतझड़ और सावन साथ रहे...
मैं खुद से करने लगा प्रेम, जो प्रेम गीत गाए हो तुम...

कभी दौड़ लगाता दूर-दूर, कभी पल भर में मायूस हुआ...
चंचल बेकल मेरे मन को, अपना बन कर भाए हो तुम...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Monday, 8 May 2017

एक रात है खामोश सी...



एक हरजाई के आये नहीं,
एक तन्हाई के जाये नहीं...
करवट बदलते रात में,
ख़्वाब उनके क्यों आये नहीं..?

एक उम्मीद है टूटे नहीं,
एक आस जो छूटे नहीं...
लहरें किनारे आ रही,
फिर भँवर क्यों आये नहीं..?

एक आईना ख़ामोश है,
एक मेहरबां रूठा हुआ...
कर लूँ मैं लाखों जतन,
पर क्यूँ उसे भाये नहीं..?

एक रात है खामोश सी,
एक दिन है बदगुमां हुआ...
फ़लक रहे कब तक तनहा,
तारों की बारात आये नहीं...

आओ मिलें ख़ुद से गले,
कर दूर सब शिकवे गिले,
वक़्त ये जो गुज़र रहा,
फिर लौट कर आये नहीं...

....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
...*9424142450#

Friday, 5 May 2017

आसमान सी आस...



बेतरतीब सी ख्वाहिशें, आसमान सी आस...
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बेतरतीब सी ख्वाहिशें, आसमान सी आस...
दूर क्षितिज सागर फैला, मिटती नहीं है प्यास...

मुठ्ठी भर साँसे महज़, फिर मिट्टी बे मोल...
परछाईं से सब रिश्ते, सतही हो या ख़ास...

पानी सा मन है सरल, रंग लो कोई रंग...
गाँठ है लगना लाज़मी, टूटे जब विश्वास...

धवल हुआ है नील गगन, रैन हुई बेचैन...
धरती अम्बर रच रहे, दूर क्षितिज पर रास...


...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#...

सुबह सी मिली वो....


ढल ही गया दिन, शाम आते आते,
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ढल ही गया दिन, शाम आते आते,
चलते नहीं तो, यूँ ही ठहर जाते...

बहल तो गया दिल, कुछ पल को मौजूं,
मिलते ना उनसे, तो दिल क्या लगाते...

बारिश की बूंदें, लटों से हैं लिपटी,
फ़ना हो रहे, गालों पे आते आते...

मिला जो भी मुझको, बेशक उसी से,
हसीं जख़्म दिल के, किसको दिखाते..?

सुबह सी मिली वो, रहा साथ दिन सा,
बिछड़ सी गयी है, शाम आते आते...

फ़ीका है अब, जायका ज़िन्दगी का,
बिन उसके 'रवीन्द्र', हम क्या गीत गाते...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Monday, 1 May 2017

टूटे हुए तारे से तुम, ना दिल लगा लेना...


दिखे ढलता हुआ सूरज, तो मायूस ना होना,
सफ़र से लौट वो शायद, अपने घर को आया है...

कभी टूटे हुए तारे से तुम, ना दिल लगा लेना,
अमानत है वो धरती की, चाहत ने बुलाया है...

किसी रोज ग़र तनहा, हो आसमां में चाँद,
समझ लेना लोरी गा के, तारों को सुलाया है...

जरा सी बात पर कोई, अगर आँखे ही नम कर ले,
उसी पल जान लेना ये, जख़्म दिल पे लगाया है...

कभी ना भूलना 'रवीन्द्र', सहारा था दिया जिसने,
हो बेशक़ दौड़ के क़ाबिल, चलना उसने सिखाया है...

....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐💐
*9424142450#

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...