Thursday, 14 December 2017

दुनियां तू सजाने को चली आ...

सब तोड़ के तिलिस्म ज़माने के चली आ,
वादे किए जो हमने  निभाने को चली आ...

अब आ भी जा सूनी है ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,
बेशक मुझे तू  छोड़ के जाने को चली आ...

सांसें  हुई  बोझिल  ये  धड़कने  गवाह हैं,
रूठे हुए से दिल को  मनाने  को चली आ...

खोई हुई मंज़िल  सभी  राहें धुआँ - धुआँ,
शम्मा मेरी महफ़िल में जलाने को चली आ...

ये काली घटाएं हैं  या  बिखरी तेरी जुल्फ़ें,
बरखा तू मेरी प्यास बुझाने को चली आ...

उलझे हुए अरमान सभी ख्वाहिशें 'रवीन्द्र',
उजड़ी मेरी दुनियां तू सजाने  को चली आ...

...© रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Friday, 8 December 2017

कुछ पल जो अकेला होता हूँ...

कुछ पल जो अकेला होता हूँ,
शब्दों की माला पिरोता हूँ,
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हँस कर आँखों को भिगोता हूँ..
कुछ पल जो....

दिल के जख्म दिखाएं किसे,
ये दर्द करें किसको बयां,
पथरीली ये जमीन हुई,
चुभता है अब आसमां,
इस लब पे बिखेरे हुए हँसी,
मैं दिल ही दिल में रोता हूँ...
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हंस कर आँखों को भिगोता हूँ...
कुछ पल जो....

भूला मुझे जहान तो क्या, 
जीवन है बियाबान तो क्या,
राह अंधेरे हैं मुमकिन,
कटते नहीं हैं ये पल छिन,
बिखरे हुए जो लमहें हैं,
यादों के हार पिरोता हूँ...
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हंस कर आंखों को भिगोता हूँ...
कुछ पल जो....

आएगा कोई राहों में,
भर लेगा मुझे बाहों में,
करवट बदल के रात कटे,
दिन सिसकी और आहों में,
ये धुँआ-धुँआ तनहा आलम,
ना जागता हूँ ना सोता हूँ,
लिखता हूँ अपने दिल की बात,
हँस कर आँखों को भिगोता हूँ...
कुछ पल जो....

कुछ पल जो अकेला होता हूँ...
शब्दों की माला पिरोता हूँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Tuesday, 5 December 2017

खुशनुमा सुबह के ओ सौदागर...


खुशनुमा सुबह के ओ सौदागर, 

बड़ा खूब ढाया है तूने कहर,
लेकर उनींदे हमारी सभी,
देते हो क्यों अलसाया सहर...

कैसी है ख्वाबों की ये अनकही,
बातें दिलों की दिल मे रही,
सुहाना लगे है ख्वाबों का सफर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...

धड़कन क्यों बेताब हैं आजकल,
सदियों सा लागे हमें एक पल,
मंज़िल से है खूबसूरत डगर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...

ख्वाहिश जवां कैसे होने लगी,
तनहाई सिसक के है रोने लगी,
आंसू हैं या कोई मीठा जहर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...

खुशनुमा सुबह के ओ सौदागर,
बड़ा खूब ढाया है तूने कहर...


...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Friday, 24 November 2017

सँवारो इन्हें.... मेरी माँ...


बेचैन मन फिर ढूंढे वो आँचल,
बन कर हवा उड़ चली हो कहाँ...

यूँ तो खिले चाँद तारे हैं बेशक,
लगे स्याह फिर क्यों हमें आसमां...

ये धरती, अम्बर, नज़ारे वही हैं,
लगे फिर क्यों सूना ये सारा जहां...

चलना सिखाया हमें थाम उँगली,
कोई देख ले बन गया कारवां...

हासिल है दुनिया सबकी नज़र में,
वक़्त भी जालिम हुआ मेहरबां...

कहने को बहुत कुछ है दिल में,
बातें किसे सब करें हम बयां...

रिश्ते हुए कई बेज़ार तुम बिन,
आ कर सँवारो इन्हें मेरी माँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

24 नवम्बर... नवम पुण्यतिथि पर ममतामयी माँ को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि...

Sunday, 19 November 2017

मन मोहन हो जाए...


कान्हा की बंशी सबको बुलाए,
राग-प्रेम का गीत सुनाए...
आँख खुले तो, जग वृन्दावन,
स्वप्न में मोहन भाए...

प्रीत की डोर बंधी है ऐसी,
भोर सुहानी, पुरवा जैसी,
तन-मन है इठलाए...
फिर कान्हा क्यों सताए...

आस मेरी है ब्रज बालाएं,
जीवन के नित आस जगाएं,
अंग अंग है मुस्काए...
मन मोहन हो जाए...

आस भरे नैनों को मूंदें,
खो कर मन, मोहन को ढूंढें,
इत उत नित सब पाए...
मन ही मन मुस्काए....

राधा रखे है, मान हिना की,
भेद न जाने, हम यमुना की,
गहरे गोते वो लगाए...
जीवन राह दिखाए...

मन मोहन हो जाए...
मन मोहन हो जाए...


...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

जय श्री कृष्णा....

Wednesday, 27 September 2017

सड़क अपने धुन में चली जा रही थी...

सड़क अपने धुन में चली जा रही थी..
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एक सड़क दूर तक, चली जा रही थी..
किनारे के पेड़ों से बतिया रही थी..
वो सड़क दूर तक, बस चली जा रही थी...

उस सड़क के किनारे, खड़े पेड़ सारे...
उन्हीं पेड़ो में एक पीपल खड़ा था...
अभी साखें थी कोपल, थोड़ा नकचढ़ा था...

उस पीपल ने सोचा, कुछ मस्ती ही कर लूँ...
छेड़ूँ सड़क को, जबरदस्ती ही कर लूँ...

सड़क से उसने पूछा कहाँ जा रही हो..?
कभी सीधी हो, कभी लचक खा रही हो...

तुम्हें क्या पता है ? तुम हो कितनी काली...
भटकते हैं तुमपे सब गुंडे मवाली...
तुम हो अमावस की इक रात जैसे, 
कभी तुमने देखी चमकती दीवाली...?

ये सुन के सड़क ने भरी साँस लम्बी...
मैं फिरती जमीं पर, नहीं गगनचुम्बी...
मैं दिखती हूँ काली, नहीं है ये कालिख...
निशानी पहियों की, जो जाते शिवालिक...

उन पहियों के ऊपर सजती है गाड़ी...
चलाते हैं जिसको, हुनरमंद या अनाड़ी...

गाड़ियों के भी कितने रूप हैं निराले...
कोई मालवाहक, कोई सवारी वाले...
किसी पर बना आशियाँ चलने वाले...
हैं उत्तर के गोरे, या दक्षिण के काले...

सभी चलते जाते हैं, रुकते नहीं हैं...
वो मंजिल हैं पाते, भटकते नहीं है...
कभी कोई छोटी सी गाड़ी में बच्चे...
चले हैं स्कूल, लेने तालीम अच्छे...

कभी कोई जाता है, सुबह को दफ़्तर...
सायकल का मालिक, या मालिक की मोटर...

कभी आती भी है कुछ ऐसी सवारी...
विदा हो सिसकती नई दुल्हन बेचारी...
मैं सुनती हूँ सबके अनोखे अफ़साने...
कमजोर सच, कुछ रंगीन बहाने...

मेरी आँख भीगे जब कोई शराबी...
राहगीर कुचले, कह वाहन की खराबी...

मैं रोती भी हूँ, देख कर हादसों को...
कोई तो सम्हालो, इन दहशत गर्दों को...

मैं कहती नहीं, कभी एम्बुलेंस ना गुजरे...
हाँ गुजरे, मगर वो प्रसव को ही गुजरे...

मैं अपने कुछ गड्ढे, छुपा भी तो लूँगी...
सुनूंगी खबर तो, मुस्का भी लूँगी...

कहूँगी फिर आना, ओ सुंदर सितारे...
देना इस सड़क को गौरव उजियारे...

तुम्हारे कदम को, तब मैं चूम लूँगी...
जाओगे सरहद, उस पल झूम लुंगी...
तुम लौटोगे लेकर के, विजयी तिरंगा...
मुझे बोध होगा, नहा ली मैं गंगा...

हाँ एक बात कहना मैं चाहूँ सदा ये...
सब मिल जुल के रहना, न करना कभी दंगा...

मैं सबके लिए हूँ, नहीं मेरा मज़हब...
मैं जाती हूँ पश्चिम, और जाती हूँ पूरब...
उत्तर में खुशबू है केसर की न्यारी...
दक्षिण में गौरव वो कन्याकुमारी...

तुम तो मगन धुन में रहते हो पीपल...
मैं गुजरूं शहर से, और जाती हूँ जंगल...

मेरे हमसफ़र हैं, ये पुल और चौराहे...
होटल-ढाबा भाई, तो बहन है सराय...

मैं बनती गली से, कभी आम रस्ता...
मैं दिखती हूँ काली, मगर ये बावस्ता...

मैं गोरों को घर से भगाई हुई हूँ...
कई राज दिल में छुपाई हुई हूँ...
मेरा रंग गोरा अगर हो ही जाये...
दाग हादसों के भला कैसे छुपाये...

इसलिए रखा मैंने, रंग अपना काला...
चलो मुझ पर संभल के, जाओ गिरजा शिवाला...

ये देते नसीहत सड़क जा रही थी...
किनारे के पेड़ों से बतिया रही थी...
कभी सीधी चलती, कभी बलखा रही थी...
देख पगडंडियों को, वो मुस्का रही थी...

खुद में कई रस्ते समाती कभी वो...
कभी खुद से रस्ता वो उपजा रही थी...
पहाड़ो पर चढ़ती, नदी पर उतरती...
हर मौसम को सहती, सजती, संवरती...

न वो घबरा रही थी, न इतरा रही थी...
वो सड़क अपने धुन में चली जा रही थी...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

निगाहें नाज़ करती हैं...

निगाहें नाज़ करती हैं
फ़लक के आशियाने से,
खुदा भी रूठ जाता है
किसी का दिल दुखाने से।

कोई संगीन मसला हो
कुछ पल भूलना बेहतर,
महज़ गाँठें उलझती हैं
ज़बरन आज़माने से।

उठो तूफ़ान की तरह
बहो सैलाब बन कर तुम,
मज़ा आता है दुनियां को
महज़ दीपक बुझाने से।

रहें कुछ फासले हरदम
नसीहत भूल ना जाना,
परख बढ़ जाती है अक्सर
किसी के दूर जाने से।

ख़्वाहिश जवां हो जब
खुद के आशियानें की,
जरूरी मशविरा करना
किसी बेहतर घराने से।

घुटन है लाज़मी उस घर
जहाँ रिश्तों में सीलन हो,
सदा परहेज करना तुम,
 यूँ किसी दर पे जाने से...

ख़बर रखना जरूरी है
पड़ोसी मुल्क़ का यारों,
उसे ताक़ीद भी करना
बदी से बाज आने से।

हुए रिश्ते कई घायल,
निगाहों में अगर शक हो,
कभी ना चूक जाना तुम,
'रवीन्द्र', रिश्ते निभाने से...


...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Monday, 25 September 2017

शब्द ही बीज हैं, शब्द ही हैं शज़र...



शब्द की बानगी, शब्द के हैं हुनर,
शब्द से हैं घिरे, ज़िन्दगी के डगर...

शब्द उम्मीद हैं, शब्द दीवानगी,
शब्द से कई रिश्ते, हैं जाते संवर...

शब्द आवाज है, शब्द अंदाज़ है,
शब्द से है घडी, शब्द से है पहर...

शब्द अभिमान हैं, शब्द ही शान हैं,
शब्द से है गली, शब्द से है शहर...

शब्द खेलेंगे जब, कभी जज्बात से,
शब्द घुल जाएंगे, बन के मीठा जहर...

शब्द को फिर संभालें आओ सभी,
शब्द ही बीज हैं, शब्द ही हैं शज़र...

शब्द तुमने कहे, वो मुझे मिल गये,
शब्द ने गुदगुदाया, मुझे रात भर...

शब्द की बातें अब, क्या कहूँगा 'रवींद्र',
शब्द से मेरी दुनियां, शब्द से मेरा घर...


...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

कुछ सांसे दो, जिंदगानी दो...





मैं मछली हूँ, मुझे पानी दो...
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मैं मछली हूँ, मुझे पानी दो...
कुछ सांसे दो, जिंदगानी दो...
मैं मछली हूँ, मुझे पानी दो...

मैं पोखर तालों में रहती, मैं हर मौसम को हूँ सहती...
चाहे मुझे कहो कुछ भी, मैं ना किसी को कुछ कहती...
मुझे बहते जल की रवानी दो...
कुछ सांसे दोजिंदगानी दो...

कुछ कसक सी मन में है ऐसी, नहीं खुलती ये गाँठ कैसी..?
हर उलझन सुलझाना चाहूँ, बनूं निर्मल अविरल जल जैसी...
मुझे बस इतनी नादानी दो...
कुछ सांसे दोजिंदगानी दो...

किसी रोज जो मिलने आओगे, कुछ हमसे भी बतियाओगे...
उस रोज मैं तुमसे पूछूँगी, सब खो कर क्या कुछ पाओगे..?
मुझे ऐसी अमिट निशानी दो,...
कुछ सांसे दोजिंदगानी दो...

वो ऊपर बैठा रखवाला, उसके हैं गिरजा और शिवाला...
सब प्यासे हैं सुख अमृत के, कौन पीये दुःख का प्याला..?
हर नम आँखों का पानी दो...
कुछ सांसे दो, जिंदगानी दो...

मैं मछली हूँ, मुझे पानी दो...
कुछ सांसे दो, जिंदगानी दो...

💐💐रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Friday, 22 September 2017

कोशिशें होंगी मुकम्मल, कारवाँ बन जाएगा...




है निज़ामों का शहर, यहाँ बात इतनी जानिए,
सर झुकाएंगे अगर, सजदा नहीं कहलाएगा...

नज़ाफ़त की ये हवा, सब कुछ उड़ा ले जाएगी,
है चिराग ए इल्म जो, कब तक छुपा रह पाएगा...

अब तो बाजू खोलिए, कैसी ज़हमत-ए-दासतां,
कोशिशें होंगी मुकम्मल, कारवाँ बन जाएगा...

ना रहे मन में भरम, अब ना कोई मलाल हो,
लिखा है जो नसीब में, वो बर्क सा लहराएगा...

चाह बरक़त की सदा, रखिएगा दिल में 'रवीन्द्र',
हौसला मत हारिेये, होगा जो देखा जाएगा...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Saturday, 9 September 2017

गीत बन कर मिलो, गुनगुनाऊँगा मैं...






गीत बन कर मिलो, गुनगुनाऊँगा मैं,
मेरी जाने ग़ज़ल, तुमको गाऊँगा मैं...

दूरियां दरमियां, और कब तक रहे,
ग़म जुदाई के हम, बोलो कब तक सहें,
और कब तक भला, आजमाऊँगा मैं,
मेरी जाने ग़ज़ल...

एक दस्तक हुई, आज दिल पे मेरे,
मेरी उम्मीद है, ये करम हो तेरे,
और कब तक यूँ ही दिल जलाऊँगा मैं...
मेरी जाने ग़ज़ल...

दिन ये ख़ामोश हैं, रात में करवटें,
आरजू है धुआँ, याद में सिलवटें,
तुमको कैसे भला, भूल पाऊँगा मैं,
मेरी जाने ग़ज़ल...

कोई पागल कहे, कोई दीवाना अब,
हो गया है मेरा, हाल देखो ग़ज़ब,
फिर भी अरमान दिल के सजाऊँगा मैं,
मेरी जाने ग़ज़ल...

गीत बन मिलो, गुनगुनाऊँगा मैं,
आओ मेरी ग़ज़ल, तुमको गाऊँगा मैं...
मेरी जाने ग़ज़ल, तुमको गाऊँगा मैं...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Thursday, 7 September 2017

यूँ ही दिल जलानेे से...

छुप गया  है चाँद क्यों, सूरज के आ जाने से,
वो भी तनहा है, सितारों के बिन ज़माने से...

मैं ही खामोश हूँ, या दौर है तनहाई का,
कोई तो मिलने हमें, आये किसी बहाने से...

ये भीड़  यूँ हर रोज, जाने कहाँ  जाती है,
इसे परहेज क्यों, कहीं भी ठहर जाने से...

चलो रूठे हुए, किस्मत को  मना लाते है,
वो  तो मान जाएगा, ज़रा सा मुस्कुराने से...

लिखा है गर साथ तो,आयेगा वो कहीं भी रहे,
मिलता नहीं सुकूं भी, यूँ ही दिल जलानेे से...

उम्र भर का साथ, देता है भला कौन यहाँ,
चली भी जाती है, वो परछाई धूप जाने से...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐

Saturday, 2 September 2017

महबूब सा मरहम नहीं...



रूठ जाये ये जहां, मुझको कोई गम नहीं...
एक तेरा साथ यारा, महफ़िलों से कम नहीं...

क़ातिलाना हर अदा, गुस्ताख़ हैं तेरी नज़र,
सब उलझने बेमायने, जो तेरे पेंचोखम नहीं...

आशिक़ी या दिल्लगी, सोचेंगे हमने क्या किया,
है मगर मालूम, कोई महबूब सा मरहम नहीं...

कीजिएगा इक इशारा, मिलने आएँगे वहाँ,
जिस जगह सैलाब ही सैलाब हो शबनम नहीं...

कोई कहता है दीवाना, कोई आवारा मुझे,
एक तेरा साथ, और चाहत कोई हमदम नहीं...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Monday, 21 August 2017

हसरत धुआँ-धुआँ हैं...

हसरत धुआँ-धुआँ हैं,
कैसा तेरा शहर...
मिलते हसीं हजारों,
लेकिन हिज़ाब में...

संगीनों के साये,
पसरे हैं हर तरफ़...
सब कुछ झुलस गया है,
मज़हब के तेज़ाब में...

कोई मसीहा बन के,
आयेगा फिर यहाँ...
मशगूल रहनुमा हैं,
इसी लब्बोलुआब में...

खिड़की भी कैसे खोलें,
बारूद की है बू...
अब तो अमन भी जैसे,
हासिल है ख़्वाब में...

खोलो गिरह ये सारे,
बढ़कर मिलो गले...
ढूंढो न कोई धब्बा,
तुम माहताब में...

कुछ इंतज़ाम ऐसा,
फिर अब न खूं बहे...
न कुरबां हों फौज़ी,
मतलब के जेहाद में...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Monday, 14 August 2017

प्रेम रंग हो मोहना...


हे मोहना, मन मोहना...
तुम आस हो, तुम स्वांस हो...

मेरे अनंतिम सोच के,
अपरिमित आकाश हो...

तुम प्रेम रंग हो मोहना,
तुम सुर-सलिल आभास हो...

जीवन का मेरे प्रमाण हो,
दुःख विनाशक बाण हो...

जीवन सफल हो मोहना,
तुम जिसके मन में हो बसे...

कभी द्रोपदी की लाज हो,
कभी पुण्य पूजित काज हो...

कुरुक्षेत्र में हे युगपुरुष,
तुम धर्म रक्षक व्यास हो...

राधा के पुष्पित प्रेम हो,
मीरा के मोहित मान हो...

आशाओं के प्रतिबिम्ब को,
स्वीकार मेरा प्रणाम हो...

...©रवीन्द्र पाण्डेय 💐💐
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Saturday, 12 August 2017

शरारत करता हूँ...

मैं ढूंढ रहा उस बचपन को,
जाने कब कैसे फिसल गया...
रुकने को बोला था कितना,
देखो वो जिद्दी निकल गया...

अब की बार जो मिल जाये,
मैं उसकी कान मरोडूँगा...
कितना भी फिर वो गुस्साये,
नहीं उसकी बाँह मैं छोडूंगा...

लेकिन वो निश्छल बचपन भी,
कब लौट के फिर आ पाता है...
अक्सर फिर छोटे बच्चों में,
हमें अपनी याद दिलाता है...

मैं अपने काँधे सर रखकर,
जागे-जागे सो जाता हूँ...
बीते लमहों की यादों में,
ना चाह के भी खो जाता हूँ...

अफ़सोस भी होता है अब तो,
जाने क्यूँ इतना बड़ा हुआ...
वो माँ की गोदी छूट गयी,
जब से पैरों पर खड़ा हुआ...

अब यही जतन मैं करता हूँ,
बचपन आँखों में भरता हूँ...
बच्चों संग मिल जुल कर,
मैं ख़ूब शरारत करता हूँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Saturday, 22 July 2017

अफ़सोस मग़र अब कहानी में...

कहती हैं दर-ओ-दीवारें सभी,
फिर कब वो मौसम आयेगा...
मैं झूम उठूँगा बरबस ही,
बचपन आँगन में समायेगा...

वो खुले गगन के नीचे सब,
फिर खाट लगाकर सोएंगे...
जब डाँट पड़ेगी नानी की,
चिल्ला चिल्ला कर रोयेंगे...

फिर मामी यूँ पुचकारेगी,
मुठ्ठी में शक्कर डारेगी...
मौसी देखेगी कनखियों से,
बिखरे बालों को सँवारेगी...

मन बहलेगा इस रिश्वत से,
मानेंगे मिला सब किस्मत से...

मुठ्ठी में भरे उन शक्कर को,
हम बड़े चाव से खाएंगे...
लौटेगी माँ जब "चुलुबन" से,
हम अपनी व्यथा सुनाएँगे...

वो गीले कपड़ों में झट से,
हमें गोद में अपने उठाएगी...
नानी का गुस्सा जायज था,
बड़े प्यार से ये समझाएगी...

हम पाकर माँ की गोदी को,
पल भर में ही इठलायेंगे...
भाई बहनों को देखेंगे,
और मन ही मन मुस्काएँगे...

जब रात घनेरी छायेगी,
और गाड़ी सीटी बजायेगी...
हम पूछेंगे नानाजी से,
क्या ट्रेन यहाँ तक आयेगी..?

नानाजी फिर समझाएंगे,
हमें किस्से नये सुनाएंगे...
हम किस्से वाली जन्नत में,
खुद को ही राजा पाएंगे...

कुछ पल बीतेगा मस्ती में,
राजा-रानी की बस्ती में...
जाने कब नींद वो आएगी,
बोझिल आँखों में समाएगी...

हम ख़्वाबों में खो जाएँगे,
और मंद मंद मुस्काएँगे...
सोए नाना के संग भले,
माँ को बाजू में पाएंगे...

अब उन्हीं दिनों की यादों में,
अक्सर मैं खोया रहता हूँ...
कहती दुनिया मैं बदल गया,
इस तंज को भी मैं सहता हूँ...

अब किसे बताऊँ दर्द अपना,
मैं सब कुछ पाकर हार गया...
ये समय बड़ा निष्ठुर निकला,
मेरे बचपन को मार गया...

अब छुट्टी बेशक आती है,
लेकिन मुझको तड़पाती है...
जब मामाघर को याद करूँ,
पलकें गीली हो जाती हैं...

मैं चाहूँ भी ग़र जाना अब,
मन यही सोच घबराता है...
अब "माँ" ही मेरी नहीं रही,
जिससे से ये सारा नाता है...

अब मेरी हँसी ठिठोली को,
कौन भला अपनायेगा...
सो जाऊँगा जब देर तलक,
अधिकार से कौन जगाएगा...

अब कौन सँवारे बाल मेरे,
मुठ्ठी में शक्कर देगा कौन...
अब डाँट कहाँ पड़ पाएगी,
गलती में भी सब होंगे मौन...

जब याद सभी की आती है,
मैं बचपन में खो जाता हूँ...
कहीं भीग न जाये नैन मेरे,
बच्चों से इन्हें छुपाता हूँ...

मैं जी लेता हूँ बचपन फिर,
इस जिम्मेदार जवानी में...
मिल आता हूँ सब अपनों से,
अफ़सोस मग़र अब कहानी में...

अफ़सोस मग़र अब कहानी में...


...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

चुलुबन  = तालाब का नाम 

खता आज हम-तुम करें...

हुई है मोहब्बत बताऊँ किसे,
किस से कहूँ और जताऊँ किसे..
ये दीवानगी अब अदा है मेरी,
सम्हालूँ इसे या मिटाऊँ इसे..?

वो लमहात कितने जूनूनी हुए,
जिसे हमने चाहा वो खूनी हुए..
दिए जख़्म दिल पे दिखाऊँ किसे,
हुई है मोहब्बत बताऊँ किसे..?

चलो इक खता आज हम-तुम करें,
खुल के जिएं अब ना घुट-घुट मरें..
मग़र ये हुनर मैं सिखाऊँ किसे,
हुई है मोहब्बत बताऊँ किसे..?

अज़ब बेक़रारी का आलम हुआ,
धड़कन है दिल की या कोई दुआ..
मैं जज़्बात अपने दिखाऊँ किसे,
हुई है मोहब्बत बताऊँ किसे..?

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Tuesday, 18 July 2017

कृतियाँ नव दीपक बन, साहित्य के अलख जगाएंगी...

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अजित कुमार जी के निधन से मन आहत हुआ है...

अश्रुपूरित शब्दांजलि.....


मौसम एक प्यारा बीत गया,
वो सबके मन को जीत गया,
अब शेष स्मृतियां जीवन भर,
हमें उनकी याद दिलाएंगी...

कुछ कर देंगी आँखें नम,
कुछ मंद मंद मुस्कायेंगी...

ये रीत जगत की न्यारी है,
निर्धारित सबकी बारी है...
वो छोड़ चले पद चिन्ह यहाँ,
जैसे सुन्दर फुलवारी है...
शब्दों भावों की फुलवारी,
तन मन को महकाएंगी...

कुछ कर देंगी आँखें नम,
कुछ मंद मंद मुस्कायेंगी...

उन्हें ढूँढेंगे अक्षर-अक्षर,
कुछ आलोकित कुछ अभ्यंतर...
कभी रस छंदों और भावों में,
जीवन के दशों दिशाओं में...
नवसृजन को दे आयाम नया,
फिर कड़ियाँ जुड़ती जायेंगी...

कुछ कर देंगी आँखें नम,
कुछ मंद मंद मुस्कायेंगी...

आओ मिल कर यशगान करें,
दिव्यात्मा का सम्मान करें...
लौट आएंगे नव रूप लिए,
उन्हें अंतर्मन से प्रणाम करें...
उनकी कृतियाँ नव दीपक बन,
साहित्य के अलख जगाएंगी...

कुछ कर देंगी आँखें नम,
कुछ मंद मंद मुस्कायेंगी...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

http://kavi-Ravindra.blogspot.com

Sunday, 16 July 2017

मंजिलों से प्यार कर...

सिमटती राहें कह रहीं, मंजिलों से प्यार कर...
धड़कनों का राग सुन, सांसों का व्यापार कर...

वक़्त से कर यारियाँ, ये जो गुजरे ना मिले...
कह दे जो दिल में तेरे, प्रेम का  इज़हार कर...

दो घड़ी -सी ज़िन्दगी, कब ये खो जाए कहीं...
जी ले हर पल मौज में, ना इसे दुश्वार कर...

है उजाला दूर तक, देख ले जी भर इसे...
रात है काली अगर, सुबह का इंतज़ार कर...

ज़िन्दगी के मायने, मिलना बिछड़ना है 'रवीन्द्र'...
हँस के जी ले हर घड़ी, यूँ ना इसे बेज़ार कर...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Saturday, 15 July 2017

बाज़ी ये कैसे पलटती नहीं...

मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर,
यकीं है सवेरा हुआ हो कहीं...

क्या होती है रातें, न जानू सजन,
रोशनी तेरे यादों की छँटती नहीं...

डगर हो, सफ़र हो, मंजिल तुम्हीं,
बिन तुम्हारे घड़ी एक कटती नहीं..

खुला आसमां और हम तुम वहाँ,
नेमत क्यूँ ऐसी बरसती नहीं..?

करो फैसला मेरे हक में 'रवीन्द्र',
देखें बाज़ी ये कैसे पलटती नहीं..?

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Friday, 14 July 2017

ख़्वाबों में महफ़िल है...

यकीं है मिलेंगे, ख़्वाबों में हम तुम,
मग़र बेकरारी में, नीदें कहाँ हैं..?

तुम्हीं से रौशन है, मेरी ये दुनिया,
तुम्हीं से खुशियों का कारवां है...

भले दूर हो तुम, जेहन में हो मेरे,
मोहब्बत दिलों में, अब भी जवां है...

फूलों में, खुशबू में, हो तुम हवा में,
तुम्हीं से यारा, ये दिलकश समां है...

चलो मूंद लेते हैं, आँखे हम अपनी,
ख़्वाबों में महफ़िल है, कहकशां है...

....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Monday, 10 July 2017

सफ़र है ये ज़िन्दगी...

ढूंढने निकला हूँ फिर मैं, ज़िन्दगी के मायने,
शाम तक शायद मिले वो, या अंधेरी रात हो...

सफ़र है ये ज़िन्दगी तो, चलते रहना लाज़मी,
है कभी तनहाईयाँ, कभी हमसफ़र का साथ हो...

एक आहट से किसी की, जोर से धड़का है दिल,
मुमकिन है ये भी दिल के, महज ख़यालात  हो...

शबनमी सुबह कभी तो, दोपहर सी हो तपिश,
अकेले हों हम कभी, और तारों की बारात हो...

चार कदमों का सफ़र, इम्तेहां है हर कदम,
मुस्कुराता चल 'रवीन्द्र', चाहे कोई हालात हो...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐

Sunday, 9 July 2017

उम्मीदों का सूरज... तू आ निकल...

कल तक तेरी तपिश से, हैरान रहा मैं...
आज ढूँढती है नजरें, बन बावरा तुझे...

एक झलक दे भी दे, अब और न तड़पा...
मिल जायेगा सुकूं और, करार बस मुझे...

एक साथ तेरा रहते, आबाद थी दुनिया...
नजरें क्या तूने फेरी, भूला जहां मुझे...

सियासत के बादल, कहीं और जा बरस...
रिश्तों की फिसलनों से, अब ले बचा मुझे...

अब के सजन सावन, दीवाना सा लगे...
तेरी याद दिलाकर ये, तड़पायेगा मुझे...

ओ मेरी उम्मीदों का, सूरज तू आ निकल...
खोई हुई है मेरी, वो परछाई दे मुझे...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Wednesday, 5 July 2017

मुस्कुरा के तो देख...

मिसालें मिलेंगी तेरे नाम की,
तू खुद को ज़रा आमा के तो देख...

चली आयेगी वो हवा की तरह,
तू मौसम की तरह बुला के तो देख...

भले दूर है खुशियों का नगर,
दो कदम ज़रा तू बढ़ा के तो देख...

सिफर है अगर हासिल-ए-ज़िन्दगी,
तू आईना ज़रा मुस्कुरा के तो देख...

रख उम्मीद में तू सुबह शबनमी,
स्याह रातों में ख़्वाब सजा के तो देख...

मिलेगा सुकूं भी दिल को 'रवीन्द्र',
हँस के रिश्ता कोई निभा के तो देख...

....©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Sunday, 2 July 2017

मैं आम आदमी...

लिखी थी ईबारत, फ़लक पे कहीं...
पढ़ ना पाया, रही आँखों में कुछ नमी...

मैं तो बढ़ता रहा, मंजिलों की तरफ...
लोग लिखते रहे, बस एक मेरी कमी...

नहीं अफ़सोस, हासिल भले कुछ नहीं...
उस फ़लक से है बेहतर, मेरी ये जमीं...

सुन ओ तकदीर, ग़र कहीं रहता है तू...
उस फरिश्ते से बेहतर, मैं आम आदमी...

चाँद तारे भी देंगे, गवाही  'रवीन्द्र',
याद आना मेरा, होगा तब लाज़मी...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

Friday, 30 June 2017

धूप मुलाकातों की...

उम्मीद-ए-रौशनी में, शब गुजार लेता हूँ...
धड़कनों की सरगम से, सुर उधार लेता हूँ...

काफ़िले वो खुशियों के, मेरी गली आएँगे...
देख के आईना, खुद को संवार लेता हूँ...

छोड़िये वो बातें, जो दिल को दुखा देती हैं...
एक मुस्कुराहट पे, सब कुछ निसार देता हूँ...

धूप मुलाकातों की, इसलिये भी जरूरी है......
एक झलक पा के, दुआएँ हजार लेता हूँ...

दिल में बसाया है ग़र, दुनिया को बताना क्या?...
शबनमी सी यादों को, दिल के तार देता हूँ...

बंद मुठ्ठियों में है, नेमत खुदा की 'रवीन्द्र',
आलम-ए-तन्हाई में, खुद को पुकार लेता हूँ...

...©रवीन्द्र पाण्डेय💐💐
*9424142450#

पल दो पल के साथ का.....

पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी रहा... ------------------------***-------------------- पल दो पल के साथ का, मुंतज़िर मैं भी...